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एंटी कम्पटिटिव समझौतों के बारे में

व्यापार में संघर्ष एक आम बात है और व्यापारी लोगों के बीच आपसी समझौते अक्सर होते हैं। ये समझौते सामान्यतया दो या उससे अधिक स्वतंत्र व्यापारियों या व्यवसायों के बीच होते हैं। इन समझौतों के माध्यम से व्यापार और व्यवसाय की व्यवस्था बनायी जाती है जो आमतौर पर संगठित तरीके से किया जाता है।

हालांकि, कुछ समझौते ऐसे होते हैं जो व्यापार में अनुचित और अवैध होते हैं। ये समझौते एंटी कम्पटिटिव समझौते के रूप में जाने जाते हैं। एंटी कम्पटिटिव समझौतों के अंतर्गत तीन प्रकार के समझौते शामिल होते हैं:

1. व्यापारों के बीच गतिरोध: इस तरह के समझौतों में दो या उससे अधिक व्यापारी एक दूसरे को गतिरोधित करते हैं या एक दूसरे को व्यवसाय से बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। इस तरह के समझौतों की एक उपयोगिता व्यापारों के बीच निष्पक्ष व्यवस्था बनाना होती है, लेकिन ये समझौते व्यापार में उत्पादों या सेवाओं की कीमतों और व्यवहार में व्यापार नियमों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

2. वित्तीय गतिरोध: इस तरह के समझौतों में एक व्यापारी दूसरे व्यापारी को वित्तीय तौर पर प्रतिबंध लगाता है। इन समझौतों से व्यापार में निष्पक्षता गुम हो सकती है और इससे व्यापार में स्थायी हानि हो सकती है।

3. उत्पादों या सेवाओं की कीमतों को समझौतें: इस तरह के समझौतों में दो या उससे अधिक व्यापारी एक दूसरे से उत्पादों या सेवाओं की कीमतों को निर्धारित करने के लिए समझौते करते हैं। इससे व्यापार में निष्पक्षता कम होती है और विक्रय या सेवा सौदों के अंत में उत्पादों या सेवाओं की कीमतों में समानता बनती है।

भारतीय कानून के तहत, ऐसे समझौतों को अनुचित माना जाता है जो व्यापार में विशेष रूप से विवादों का कारण बनते हैं। एंटी कम्पटिटिव समझौतों को रोकने के लिए कानून में कुछ सख्त नियम लागू होते हैं जो व्यापारियों के बिना विवादों के समाधान की व्यवस्था करते हैं।

कुल मिलाकर, एंटी कम्पटिटिव समझौते व्यापार में असंगत और अवैध होते हैं। इन समझौतों से व्यापार में स्थायी हानि हो सकती है और उत्पादों या सेवाओं की कीमतों में समानता बनने की आशंका होती है। व्यापारी लोगों को इन समझौतों से बचना चाहिए, और कानून द्वारा निर्धारित संगठन व्यवस्था का पालन करना चाहिए जो व्यापारियों के बीच निष्पक्षता बनाए रखती है।